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क्या बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार थे ?

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क्या बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार हैं ?

वैसे तो मैंने बुद्धावतार पर एक लघु लेख तीन वर्ष पूर्व २०१७ में ही लिखा था जिसपर कई मान्य विद्वानों की आपत्ति यह कह कर आई थी कि श्री पुरी शंकराचार्य जी आदि जब अजिन/अजनपुत्र महात्मा बुद्ध को अवतार मानते हैं तो आप उनके साथ साथ शुद्धोदनपुत्र क्षत्रिय गौतम बुद्ध को क्यों अवतार मानते हैं ? उस समय मेरे पास दो चार प्रमाण थे अपने मत पक्ष में, किन्तु विरोध इतना दृढ़ था कि मैं चुप रहा। तीन वर्षों के गहन शोध के बाद दुर्लभ सनातनी एवं बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन के अनंतर आज उसी विषय पर विस्तृत प्रमाणों के साथ पुनः लेखन कर रहा हूँ।

बुद्धावतार के विषय में कुछ धारणाएं निम्न हैं –

१) सनातनी मानते हैं कि बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार हैं।
२) बौद्ध मानते हैं कि बुद्ध स्वतन्त्र हैं, किसी के अवतार नहीं।
३) कुछ सनातनी मानते हैं कि गौतम ही एकमात्र बुद्ध हैं और उन्होंने ही बौद्ध धर्म चलाया।
४) कुछ अधिक अध्ययन करने वाले सनातनी मानते नहीं कि नहीं, गौतम से पूर्ववर्ती अजिनपुत्र बुद्ध भी थे और वही भगवान् विष्णु के अवतार हैं।
५) कुछ लोग मानते हैं कि गौतम बुद्ध, अजिनपुत्र महात्मा बुद्ध, ये सभी भगवान् विष्णु के ही अवतार हैं एवं बुद्ध अनेकों हुए हैं और आगे भी होंगे।

मैं शास्त्र प्रमाण और परम्परा के आधार पर यह मानता हूँ कि आस्तिक एवं नास्तिक दर्शन दोनों साथ साथ ही आये हैं। नास्तिक दर्शन के प्रसार हेतु समय समय पर बुद्धों का अवतार होता आया है एवं ब्राह्मण महात्मा बुद्ध तथा क्षत्रिय गौतम बुद्ध, दोनों ही भगवान् विष्णु के अवतार हैं। अब पुनः लोग कहेंगे कि आपके वचन का श्रीकरपात्री स्वामी आदि के वचनों से विरोध हो रहा है, तो मैं यही कहूंगा कि इस लेख को ध्यान से समझते हुए पढ़ें तो आपको मेरे कथन का पूर्ण बोध हो जाएगा।

बहुतायत से ऐसे लोगों की संख्या विश्व में व्याप्त है, जो बुद्ध को भगवान् विष्णु का अवतार मानते हैं | वहीं कई ऐसे लोग हैं, जो बुद्ध को भगवान का अवतार स्वीकार ही नहीं करते | अस्तु, प्रथम तो हम बुद्ध शब्द पर ध्यान देते हैं | बुद्ध का शाब्दिक अर्थ है, जागृत होना, सतर्क होना तथा जितेन्द्रिय होना | वस्तुतः बुद्ध एक व्यक्तिविशेष का परिचायक न होकर स्थितिविशेष का परिचायक है | वर्तमान समय में बुद्ध शब्द का व्यापक प्रयोग राजकुमार सिद्धार्थ के परिव्राजक रूप के लिए किया जाता है | हमारे धर्मग्रन्थ तथा ऋषियों ने इस सन्दर्भ में क्या कहा है, इस बात की चर्चा आज हम करेंगे |

सनातन धर्म की प्रवृत्ति प्रारम्भ से ही बड़ी उदार है | हमारे यहाँ किसी भी विषय, सिद्धांत और मत पर व्यापक चर्चा एवं विमर्श का स्थान उपलब्ध है | इसीलिए हमारे धर्मशास्त्रों में एक अंग दर्शनग्रन्थ का भी है | दर्शन का अर्थ है, दृष्टिकोण | यहाँ दर्शन का अर्थ है, धर्म को देखने का दृष्टिकोण | आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन, दोनों की व्यवस्था हमारे यहाँ की गयी है, क्योंकि यदि अन्धकार न रहे तो प्रकाश की परवाह कौन करे ? अज्ञान न रहे तो ज्ञान का महत्त्व कैसे प्रतिपादित होगा ? आस्तिक दर्शन में पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, सांख्य, योग, न्याय तथा वैशेषिक दर्शन का नाम आता है, तथा नास्तिक दर्शन में बौद्ध, जैन तथा चार्वाक दर्शन का |

एक भ्रम लोगों में बहुतायत से व्याप्त है कि गौतम ही बुद्ध थे | एक दूसरा भ्रम यह भी व्याप्त है कि गौतम बुद्ध नहीं थे, बल्कि बुद्ध कोई और थे | जबकि सत्य यह है कि गौतम ही नहीं, गौतम भी बुद्ध थे | वस्तुतः बुद्ध एक नहीं बहुत हैं | जैसे कि पूर्व में बताया गया कि बुद्ध मात्र एक स्थिति विशेष का नाम है, तो उस स्थिति में पहुँचने वाला प्रत्येक प्राणी बुद्ध कहलाया | युगाधारित अवतारों में व्यास का कार्य है, वेदों का विभाजन, पुराणों का संकलन, तथा ग्रंथों का संरक्षण | बुद्ध का कार्य है, समाज में जो लोग धर्म के नाम पर पाखंड तथा पशुहिंसा आदि करें, ऐसी आसुरी सम्पदा से युक्त पुरुषों को मायामय उपदेश के द्वारा सनातन से विमुख करना, जैसे किसी फोड़े को शरीर से काट कर इसीलिए अलग कर दिया जाता है कि वह अन्य अंगों को क्षति न पहुंचा सके | कल्कि का उद्देश्य है, बौद्ध, जैन तथा म्लेच्छों का विनाश करके पुनः विशुद्ध सनातन को स्थापित करना तथा व्यवस्था परिवर्तन करना |

इस संसार में वेद से इतर कुछ भी नहीं। इस संसार में स्वतः प्रमाण वेद भगवान् का समर्थन और प्रतिपादन न करने वाला वाक्य मान्य और प्रामाणिक नहीं। अतः एक सच्चा वैदिक वही है जो पुराण द्वेष न करे क्योंकि वेदों के पोषक पुराण ही हैं । एक सच्चा पौराणिक वही है जो वेद निंदा न करे क्योंकि वेद सभी तत्वों के मूल हैं।

बुद्ध एक नहीं हुए हैं | अनेकों बुद्धों का आगमन हो चुका है, तथा अनेकों बुद्ध आयेंगे | प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, कुशल, मैत्रेय, गौतम, कश्यप, शक्र, अर्यमा, शाक्यसिंह , क्रतुभुक, कृती, सुखी, शशांक, निष्णात, सत्व, शिक्षित, सर्वग्य, सुनत, रुरु, मारजित्, बुद्ध, प्रबुद्ध आदि कई बुद्धों एवं बोधिसत्वों का वर्णन आता है | अब बौद्धावतार का कारण बताते हैं |
मिश्रदेशोद्भवाम्लेच्छाः काश्यपेनैव शासिताः।
…..
शिखासूत्रं समाधाय पठित्वा वेदमुत्तमम् |
यज्ञैश्च पूजयामासुर्देवदेवं शचीपतिम्॥
…..
अहं लोकहितार्थाय जनिष्यामि कलौयुगे।
…..
कीकटे देशमागत्य ते सुरा जज्ञिरे क्रमात् |
वेदनिन्दां पुरस्कृत्य बौद्धशास्त्रमचीकरन् ॥
…..
वेदनिन्दाप्रभावेण ते सुराः कुष्ठिनोऽभवन् ।
…..
विष्णुदेवमुपागम्य तुष्टुवुर्बौद्धरूपिणम् ।
हरिर्योगबलेनैव तेषां कुष्ठमनाशयत्॥
(भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व, खण्ड – ०४, अध्याय – २०)

कलियुग के आने पर मिस्र देश में उत्पन्न कश्यप गोत्रीय म्लेच्छों ने शिखा रख कर तथा जनेऊ धारण करके स्वयं को ब्राह्मण घोषित कर दिया तथा स्वयं भी वेदपाठ करते हुए देवताओं का पूजन करने तथा कराने लगे | इससे त्रस्त होकर देवताओं ने देवराज इंद्र के समक्ष जाकर समाधान हेतु निवेदन किया | देवराज ने उनकी प्रार्थना पर उन असुर म्लेच्छों को मोहित करने के लिए बौद्धमार्ग का विस्तार करके वेदों कि निंदापरक ग्रंथों को लिखने के लिए बारहों आदित्य के साथ कीकट में अवतार लिया | वेदनिन्दा करने के कारण उन्हें कुष्ठ हो गया अतः वे समस्त देवगण बुद्धरूपधारी विष्णु जी के पास गए जिन्होंने अपने योगबल से उनका रोगनाश किया |

तो वस्तुतः बुद्ध का आगमन सनातन धर्म के अंदर जिन म्लेच्छों ने घुसपैठ कर रखी थी, उनके विनाश के लिए हुआ था |
श्रीमद्भागवत में भी वर्णन है “धर्मद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां……वेषं विधाय बहुभाष्यत औपधर्म्यं” तथा
“ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् |
बुद्धो नाम्नाजिन सुतः, कीकटेषु भविष्यति” |
असुरों को मोहित करने के लिए बुद्ध का अवतार हुआ था | सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि का उपदेश देने के कारण उन्हें अधार्मिक तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु वेद तथा ईश्वर निंदक होने के कारण वे धार्मिक भी नहीं कहलाये | अतः उन्हें उपधार्मिक कहा गया है |

कुछ अन्य जन यह बात भी करते हैं कि वस्तुतः विष्णु के अवतारों में पहले बलराम तथा कृष्ण को अलग अलग गिना गया था तथा बाद में आदि गुरु शंकराचार्य जी ने बलराम को हटा कर बुद्ध को सम्मिलित कर दिया | लेकिन इसका कोई प्रमाण न आदिशंकराचार्य जी के किसी ग्रन्थ में में मिलता है और न ही वर्तमान में किसी शांकरपीठ के पास इसका प्रमाण है | साथ ही कभी शंकराचार्य जी ने भी नहीं कहा कि बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं थे और न ही दलाई लामा इसे अस्वीकार करते हैं | कुछ मूर्ख तो यह भी कहते हैं कि दशावतार में बुद्ध का नाम नहीं है, इसे बाद में जयदेव कवि ने जोड़ दिया। हाँ, इस बात के कई प्रमाण अवश्य हैं कि तंत्रग्रंथों तथा पुराणों में शंकराचार्य जी के आगमन से बहुत पूर्व से ही विष्णु भगवान के बौद्धावतार की बात कही गयी थी और श्रीमद्भागवत आदि कई ग्रन्थों में बलराम जी को अवतारों की सूची से हटाये बिना ही बौद्धावतार का उल्लेख है | ऐसे ही प्रमाण देवीभागवत, विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण, नृसिंह पुराण आदि में भी प्राप्य हैं |

अस्तु, अब लोग बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार तो स्वीकार कर लेंगे परन्तु यह कहेंगे कि यहाँ तो कीकट प्रान्त में अजिन के पुत्र के रूप में वर्णन हैं | फिर हम गौतम को क्यों माने कि वे बुद्ध थे और भगवान के अवतार थे ? इसका प्रमाण भी पुराणों में प्राप्य है |

एतस्मिनैव काले तु कलिना संस्मृतो हरिः |
काश्यपादुद्भवो देवो गौतमो नाम विश्रुतः |
बौद्धधर्मं समाश्रित्य पट्टणे प्राप्तवान्हरिः |
(भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व, खण्ड – ०१, अध्याय ०६, श्लोक – ३६)

कलियुग की प्रार्थना पर काश्यप गोत्र में भगवान विष्णु ने गौतम के नाम से अवतार लेकर बौद्धधर्म का विस्तार करते हुए पटना चले गये |

पुनः लोग यह शंका करेंगे कि हमें राजा शुद्धोदन का भी नाम चाहिये, तो इसका प्रमाण भी उपलब्ध होता है |

शुद्धोदनस्तमालोक्य महासारं रथायुतैः।
प्रावृतं तरसा मायादेवीमानेतुमाययौ॥ ….
बौद्धा शौद्धोदनाद्यग्रे कृत्वा तामग्रतः पुनः।
योद्धुं समागता म्लेच्छकोटिलक्षशतैर्वृताः॥
(कल्कि पुराण)

इस प्रसंग में वर्णन है कि जब कल्कि भगवान् बौद्धों और म्लेच्छों का विनाश करने लगेंगे तो बुद्ध, उनके पिता शुद्धोदन तथा माता मायादेवी पुनः प्रकट होंगे तथा म्लेच्छों के साथ मिलकर कल्कि से युद्ध करेंगे | इसी युद्ध के वर्णन के अंतर्गत वर्णन है कि जब शुद्धोदन हार कर मायादेवी को बुलाने चला गया तो बौद्धों ने शुद्धोदन के पुत्र का आश्रय लेकर लाखों करोड़ों म्लेच्छों कि सहायता से युद्ध करना आरम्भ किया |

इस प्रकार से सभी प्रमाणों को एक साथ देखा जाय तो बुद्ध कई हैं, तथा सभी अवतार ही हैं जो उद्देश्य विशेष से यथासमय आते हैं | यदि प्रकाश में व्यक्ति हत्या कर रहा हो तो प्राण बचाने वाला अन्धकार कर देता है | वैसे ही जब धर्म का नाम लेकर म्लेच्छों में ब्राह्मण बन कर अधर्म प्रारम्भ किया तो उन्हें ठीक करने के लिए भगवान ने बुद्ध के रूप में आकर कहा कि जिस ईश्वर और धर्म के नाम पर तुम ये सब कर रहे हो, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है | बाद में जयदेव कवि आदि ने भी कारुण्यमातन्वते, निन्दसि यज्ञविधे, सदयपशुघातम् आदि शब्दों के द्वारा इसी बात को प्रमाणित किया कि श्रीहरि का ही अवतार भिन्न भिन्न समयों में बुद्ध को रूप में हुआ था |

एतेन्ये च त्रयीबाह्या: पाखण्डा: पापचारिण:।
पाशब्देन त्रयीधर्म: पालनाज्जगतः स्मृत:।
तं खंडयन्ति यस्मात्ते पाखण्डास्तेन हेतुना॥
(माहेश्वर तंत्र, अष्टादशपटल)

जो वेदत्रयी को न माने, वह पापाचारी ही पाखण्डी है। ‘पा’ शब्द से वेदत्रयी के धर्मानुसार लोकव्यवहार करना बताया गया है। जो उसका खण्डन करे वही पाखण्डी बताया गया है।

तपश्चरसु सर्वेषु असुरेषु जयार्थिषु।
विष्णु: सुदुस्तरां मायामास्यास्य सुरनोदित:॥
मोहयामास योगात्मा तपोविघ्नाय तान्प्रभु:।
स मूढान् बुद्धरूपेण तानुवाच महामना:॥
शक्या जेतुं सुराः सर्वे युष्माभिरितिदर्शनै:।
बौद्धधर्मं समास्थाय शक्यास्ते बभूविरे॥
तानुवाचार्हतो मम यूयं भवत मद्विधा:।
ज्ञानेन सहितं धर्मं ते चार्हन्त इति स्मृताः॥
बौद्धश्रावकनिर्ग्रंथा: सिद्धपुत्रास्तथैव च।
एते सर्वेपि चार्हंतो विज्ञेया दुष्टचारिण:॥

(माहेश्वर तंत्र, अष्टादश पटल)

विजय की कामना से तपस्या करने वाले असुरों को विष्णु भगवान ने मोहित करने वाली माया से वश में करके बुद्ध रूप धारण करके कहा :- “दर्शनों के पालन से सभी देवता आप लोगों के द्वारा जीते जा सकते हैं अतः आप सब बौद्ध धर्म में आस्थावान् होकर उन्हें जीत सकते हैं।” बुद्ध भगवान के ऐसा करने पर वे असुर बौद्ध मतावलंबी हो गए। उन्हें धर्मलोप किया देख भगवान ने कहा, जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम सब हो जाओ और बताए गए ज्ञान के सहित इस बौद्ध धर्म का पालन करो। इसीलिए वे सब पुनः अर्हत कहाये। बौद्ध श्रावक, निर्ग्रंथी, और सिद्धपुत्र (जैनी) ये सब दुष्ट बुद्धि वाले अर्हन्त के नाम से जाने गए।