Home प्रश्न समाधान मोक्ष क्या है एवं इसे कौन प्राप्त कर सकता है ?

मोक्ष क्या है एवं इसे कौन प्राप्त कर सकता है ?

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देवमणि मिश्र :- मनुष्य के अलावा अन्य प्राणी मोक्ष की इच्छा करते हैं अथवा नहीं, एवं वे मोक्ष के अधिकारी है या नहीं, कृपया शास्त्रीय मार्गदर्शन दें। मनुष्य के अलावा अन्य प्राणी किस प्रकार से मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं ?

श्रीभागवतानंद गुरु :- मनुष्य मोक्ष की इच्छा करता है भला ? जो मोक्ष की इच्छा करता है, वह उसके लिए प्रयासरत भी रहता है। आपको कितने दिख रहे हैं, प्रयासरत ? साधारण सा मनुष्य थोड़ा ज्ञान और धन पा जाने से मोहित हो जाता है, फिर बड़े ऐश्वर्य वाले देवता कितते मोहित रहते होंगे ? मोक्ष की इच्छा विवेकी ही करता है। और यदि वह विवेक पशु में है (पूर्वजन्म की स्मृति होने से) तो वह भी मोक्ष चाहेगा। मनुष्य में है, तो वह भी चाहेगा और देवताओं में हो तो वे भी चाहेंगे।

विवेक इस संसार का सबसे दुर्लभ तत्व है। विवेक को प्राप्त करने के लिए अत्यंत दिव्य पुण्य बल की आवश्यकता है। सबसे पहले तो हम समझते हैं कि मोक्ष है क्या, आखिर हमें मोक्ष की आवश्यकता क्यों है अथवा मोक्ष के ना मिलने से हानि क्या है ! जीव, ब्रह्म का वह प्रारूप है जिसमें वह माया के आवरण के अंदर है। जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है, दोनों ही एक ही चेतन की अलग-अलग स्थितियों के नाम हैं किंतु माया की उपस्थिति यदि चेतन के ऊपर हो तो वह जीव है, और यदि चेतन के अंदर उसके अधिकार के अंतर्गत हो तो वह ब्रह्म है।

पाशबद्धस्सदा जीवः पाशमुक्तस्सदा शिवः॥

माया के इसी आवरण को हटाकर बाहर स्थित माया को अपने अंदर समाहित करके उसके त्रिगुणात्मक विक्षेप से स्वयं को मुक्त करके अपने मूल स्वरूप का प्रकाशन करना ही मोक्ष है। यह शरीर के साथ भी हो सकता है और शरीर के बिना भी। शरीर के साथ होने पर उसकी संज्ञा जीवन्मुक्त हो जाती है। जन्म मरण के चक्र से छूटकर शुभाशुभ कर्मों के बंधन से स्थाई निवृत्ति प्राप्त करके अपने चिन्मय स्वरूप का प्रकाशन ही मोक्ष है।

यह भी विचारणीय है कि इसके कई प्रकार हैं। जिसमें दो मुख्य हैं एक क्रम मुक्ति और दूसरी सद्यः मुक्ति। क्रम मुक्ति में जीव मोक्ष मार्ग की ओर धीरे-धीरे एवं कई पड़ाव के बाद बढ़ता है, जबकि सद्यः मुक्ति में उसे तत्काल ही बंधनों से मुक्ति मिलती है। अब हम यह जानते हैं कि सद्यः मुक्ति को कैवल्य भी कहा गया है और क्रम मुक्ति में सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य — पाँच प्रकार की मुक्ति होती हैं। ‘सालोक्य’ मुक्ति में भगवान का लोक प्राप्त होता है। भगवान के समान ऐश्वर्य की प्राप्ति का नाम ‘सार्ष्टि’ है। भगवान की निकटता की प्राप्ति का नाम ‘सामीप्य’ है। भगवान जैसे रूप की प्राप्ति को ‘सारूप्य’ मुक्ति कहते हैं। भगवान से एकाकार हो जाना ‘सायुज्य’ मुक्ति है। सगुण साकार में एकाकार हुए तो सायुज्य है, निर्गुण निराकार में लीन हुए तो कैवल्य या निर्वाण है।

अब हम या देखते हैं कि मुक्ति की प्राप्ति के माध्यम क्या क्या हैं। सबसे पहले तो पुण्य या पाप से मुक्ति नहीं मिलती। पुण्य और पाप दोनों ही कर्म बंधन में बांधने वाले हैं, दोनों का अभाव ही मोक्ष है। इसके लिए आवश्यक है कि पुण्य अथवा पाप के प्रति आसक्ति रखे बिना प्राकृतिक रूप से कर्म करते चलना है। जिस प्रकार से नदी के प्रवाह में पड़े हुए पत्ते की कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं होती अपितु वह जल के प्रवाह के ही समान गतिशील होता है, उसी प्रकार व्यक्ति भी अपनी स्वतंत्र शुभाशुभ इच्छाओं का परित्याग करके यदि केवल कर्तव्य कर्मों के प्रति आचरण करे, तो उसके कर्म बंधन का धीरे-धीरे स्वतः लोप हो जाता है और यही क्रम मुक्ति का प्रथम सोपान है।

पुण्य से सुख की प्राप्ति होती है, तथा पाप से दु:ख की प्राप्ति होती है किंतु मोक्ष दोनों से नहीं मिलता। मोक्ष के लिए सुख के प्रति आसक्ति और दु:ख के प्रति द्वेष का परित्याग करना पड़ता है। यह विचारणीय है कि मनुष्य जीवन मोक्ष प्राप्ति का सर्वाधिक उत्कृष्ट माध्यम है क्योंकि शरीर के इस प्रारूप में अनंत चिंतन-मनन एवं साधना की संभावना है. देवताओं का शरीर मोक्ष के लिए इसीलिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि वह ऐश्वर्य तथा सिद्धियों के बंधन में, अहंकार अथवा मोहजन्य शक्तियों एवं विषयों के प्रभाव में रहता है। पशुओं का शरीर भी अत्यधिक तमोगुणी होने से अध्यात्म चिंतन के लिए उपयुक्त नहीं है, तो मनुष्य शरीर की विलक्षणता ही इसे मोक्ष के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बनाती है हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पशु अथवा देवता मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। हम यह भी नहीं कह सकते कि सभी मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर ही लेंगे।

यहां पर यह ध्यान देने की बात है कि मोक्ष (अर्थात् यह क्रम मुक्ति की बात है) उस स्थिति में क्रम मुक्ति को प्राप्त करने में पुण्य बल कुछ सहायक अवश्य सिद्ध होता है जैसे भगवान् के नाम के संकीर्तन से, उचित पात्र को दिए गए दान से, किसी के प्रति द्वेष का परित्याग करके किए गए सदाचरण से, तथा अपने कर्तव्य कर्मों के पालन से उत्पन्न पुण्य मुक्ति की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है। हालांकि पुण्य भी एक प्रकार के बंधन का निर्माण करता है, किंतु वह बंधन सालोक्य अथवा सायुज्य मुक्ति के प्रारूप में भगवान से संबंधित होने से कल्याणकारी ही है। कैवल्य/निर्वाण की प्राप्ति पुण्य और पाप के अभाव से ही संभव है। यही कारण है की जय-विजय जैसे सालोक्य एवं सामीप्य मुक्ति प्राप्त पार्षद भी भगवान् की माया से मोहित होकर संत जनों के अपमान के फलस्वरूप 3 जन्मों तक राक्षस बन कर पुनर्जन्म के चक्र में भटकते रहे। यद्यपि क्रम मुक्ति का अधिकारी बनने के बाद भगवान स्वयं उस जीव का भार वहन करते हैं एवं किसी परिस्थिति में उसके पतन की संभावना होने पर स्वयं हस्तक्षेप करके उसकी रक्षा करते हैं।

तीर्थ, संत, यज्ञ इत्यादि के प्रभाव से पशु और देवता भी क्रम मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं यदि हम भगवान के नाम का सुमिरन करके अथवा कोई शुभ तिथि में योग्य पात्र को दान देकर उस पुण्य का पुनः दान किसी पशु के लिए करते हैं तो वह संस्कार उस पशु के प्रारब्ध के साथ जुड़कर उसे क्रम मुक्ति की ओर प्रेरित करता है। कुछ परिस्थितियों में वह पशु सीधे भगवान के लोक को प्राप्त करता है और कुछ परिस्थितियों में अगले जन्म में मनुष्य बनकर पुनः विधिपूर्वक तपोबल, ज्ञानबल, तथा भक्तिबल से मोक्ष का अधिकारी होता है। पशु स्वतंत्र रूप से कर्म करके अथवा कर्म बंधन से मुक्त होकर मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता। हां, उसके किसी पूर्व कृत कर्म के फलस्वरूप यदि गंगा, सरयू, नर्मदा, पुष्कर, वाराणसी, कामाख्या, प्रयाग, अयोध्या, वृंदावन आदि तीर्थों का संसर्ग प्राप्त हो जाए तो उस दैवीय उर्जा के फलस्वरूप क्रम मुक्ति के लिए नामांकित हो जाता है, यही बात शेष मनुष्य तथा देवताओं के लिए भी समझना चाहिए।

मोक्ष देने में सभी देवता अधिकृत नहीं हैं। ब्रह्म के सृजक स्वरूप की प्रधानता धारण करने वाले भगवानन् सूर्य, पालक स्वरूप की प्रधानता धारण करने वाले भगवान् विष्णु, संहारक स्वरूप की प्रधानता धारण करने वाले भगवान् शिव, अनुग्रह स्वरूप की प्रधानता धारण करने वाले भगवान् गणेश, निग्रह स्वरूप की प्रधानता धारण करने वाली भगवती दुर्गा तथा कुछ के मत से भगवान् कार्तिकेय भी मोक्ष देने में समर्थ हैं। यहां ध्यातव्य है कि इन ब्रह्मात्मक देवों के अवतार जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण, देवी काली, देवी पार्वती आदि भी मोक्ष देने में सर्वथा समर्थ हैं। इनके अतिरिक्त जो देव स्वयं कर्मबंधन में लिप्त हैं वे मोक्ष देने में समर्थ नहीं हैं। यहां तक ब्रह्मा जी को भी मोक्ष देने में समर्थ नहीं बताया गया है। हां, उन्हीं के दूसरे प्रारूप भगवान सूर्य को मोक्षदायी बताया गया है। सद्यः मुक्ति केवल ब्रह्म ज्ञान से संभव है। इसीलिए कहा गया है :-

ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः
ब्रह्मात्मैकत्व बोधेन मोक्ष: सिद्ध्यति नान्यथा।

किंतु क्रम-मुक्ति तीव्रभक्ति, सभी प्राणियों के प्रति कृपा तथा अपने उपर्युक्त मोक्षदायी इष्ट के प्रति अनन्यता से संभव है। पशु आदि की योनि में बंधा जीव अपने स्वतंत्र प्रयत्न से मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता किंतु किसी और के दिए गए पुण्य बल से तथा तीर्थ आदि के संसर्ग से प्राप्त ऊर्जा के माध्यम से अपने पूर्वकृत अशुभ प्रारब्ध का नाश करके क्रम मुक्ति का अधिकारी बनता है।

उदाहरण हेतु जिस प्रकार जैसे आपको दिल्ली से प्रयाग जाना है। आपके पास अपना वाहन है, सारे संसाधन हैं, आपको मार्ग का एवं लक्ष्य का बोध भी है, तो आप प्रयाग पहुंचने के योग्य अधिकारी हैं। मनुष्य शरीर, जिस में रहने वाला जीव अपने मूल स्वभाव के प्रति, ब्रह्म की प्राप्ति के प्रति प्रयत्नशील है, विवेक संयुक्त है, उसकी स्थिति ऐसी ही है, किंतु जैसे सभी मनुष्य मोक्ष के महत्व को नहीं जानते और अज्ञान के कारण मोक्ष की इच्छा भी नहीं करते क्योंकि उन्हें उसके विषय में पता ही नहीं है, उसी प्रकार सभी पशु देवता भी मोक्ष की इच्छा नहीं करते। उनका चित्त माया के बंधन के कारण भ्रमित होता रहता है।

अब हम दूसरी स्थिति की बात करते हैं। आप अपने वाहन से प्रयाग जा रहे हैं। मार्ग में कोई दूसरा व्यक्ति आपको मिला, उसे भी प्रयाग जाना है, किंतु उसके पास संसाधन नहीं है, तो आप कृपा करके उसे अपने वाहन में स्थान देकर साथ ही प्रयाग ले जाते हैं। यह स्थिति उन लोगों के साथ लागू होती है जो मोक्ष के महत्व को जानते तो हैं, किंतु उसकी विधि नहीं जानते, फिर विज्ञानी महात्माओं की शरण ग्रहण करते हैं और उनके संसर्ग से क्रम मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

अब हम तीसरी स्थिति की बात करते हैं। किसी व्यक्ति को प्रयाग जाना तो है किंतु उसे मार्ग का भी ज्ञान नहीं, और संसाधन भी नहीं तथा स्वयं भी बीमार होने के कारण वहां नहीं जा सकता। तब कोई कृपा करके एंबुलेंस की व्यवस्था करके उसे वहां तक पहुंचाता है। यही स्थिति पशुओं की है। वे उस कष्ट से मुक्ति तो चाहते हैं, किंतु मुक्ति अथवा उसकी विधि का कोई बोध नहीं होता। तब कोई दयालु उनपर कृपा करके अपने किए गए सत्कर्म का पुण्यफल उन्हें प्रदान करके सत्वजन्य बलपूर्वक क्रम मुक्ति की ओर अग्रसर करता है।

मनुष्य जीवन मोक्ष के लिए ही मिला है, इसका कोई और उपयोग समुचित नहीं। यदि मनुष्य जीवन मिलने के बाद, साथ ही सनातनी समाज का अंग बनने के बाद पुनर्जन्म होना, अथवा कम से कम मनुष्य जीवन की अपेक्षा कोई और निकृष्ट योनि की प्राप्ति होना इस जीवन की विफलता ही मानी जाएगी। मोक्ष में सभी अधिकारी हैं। ऐसा नहीं है कि पशु को या देवता को या किसी समाज विशेष को मुख्य से वंचित रखा गया है, किंतु मोक्ष प्राप्ति की विधि एवं काल सबके लिए भिन्न-भिन्न है क्योंकि सबके प्रारब्ध और पूर्व कृत कर्म के संस्कार भिन्न भिन्न है। जो जहां जैसे फंसा है, जितना फंसा है, उसी आधार पर न मुक्त होगा।