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भगवान् किसे कहते हैं ?

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डॉ त्रिभुवन सिंह – भगवान् किसे कहते हैं ?
श्रीभागवतानंद गुरु – आपसे पूर्व भी कई जनों के मन में यह प्रश्न आ चुका है, जिसका सनातनी शास्त्र बहुत व्यापकता से समाधनात्मक वर्णन करते हैं। उसमें से सबों का वर्णन करना तो न सम्भव है और न ही वांछित। अतएव मैं कतिपय प्रमाणों से आपकी जिज्ञासा का शमन करूँगा।

वैसे तो दिव्य गुणों से युक्त महापुरुषों के नाम के आगे हम आदर से भगवान् शब्द लगाते हैं, जैसे भगवान् शंकराचार्य, भगवान् रामानुजाचार्य, श्रीगुरुदेव भगवान् आदि … किन्तु भगवान् शब्द की शास्त्रीय परिभाषा के विषय में निम्न वचनों का अवलोकन करें।

पूर्वकाल में महर्षि काश्यप के मन में भी भगवान् शब्द को लेकर शंका हुई, सो उन्होंने विश्वामित्र जी के पास जाकर प्रश्न किया था।

काश्यप :—
भगवत्परमित्युक्तं तन्त्रमेतत्त्वया गुरो।
किमर्थो भगवच्छब्द: कीदृशो भगवांश्च स:॥
काश्यप जी ने कहा – हे गुरुदेव! तन्त्र का उपदेश करते हुए अपने किसी भगवत् शब्द की बात बताई। कृपया बताएं कि भगवत् शब्द का क्या अर्थ है, एवं भगवान् कैसे होते हैं ?

(भगवत् और भगवान् शब्द समान ही हैं, केवल व्याकरण के अनुसार कुछ स्वरूपभेद मात्र है।)

विश्वामित्र:-
वदामि भगवच्छब्दं श्रृणुष्व मुनिसत्तम।
ज्ञानं निस्सीममैश्वर्यमनन्यपुरुषाश्रयम्॥
सर्वातिशायिनी शक्ति: बलं सर्वोत्तमं तथा।
अन्यैरहार्यं वीर्यं च तेज: सर्वोत्तरोत्तरम्॥
एतानि षडुदीर्यन्ते भगशब्देन काश्यप।
यस्मिन्निमे गुणा: सन्ति स उक्तो भगवानिति॥
(विश्वामित्र संहिता, अध्याय चार, श्लोक १-४)

विश्वामित्र जी ने कहा – हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपको भगवत् शब्द के विषय में बताता हूँ, ध्यान से सुनें।
१) ब्रह्मतत्व का स्वाभाविक ज्ञान
२) किसी सीमा के बंधन से परे एवं बिना किसी अन्य से आश्रय में रहने वाला अपार धनादि का ऐश्वर्य
३) सबों के अंदर समाहित रहने वाली शक्ति का स्वामी
४) साथ ही स्वयं भी सबसे अधिक बलवान्
५) आंतरिक रूप से किसी से पराजित न होने वाला सत्वबल
६) सबसे श्रेष्ठ तेजस्विता

इन छः विशेषताओं को “भग” कहा जाता है। जिसमें एकत्रित रूप से यह सभी गुण हों, उसे भगवान् कहा जाता है।

इसके आगे भी कुछ वाक्य देखें।

भावानुरूपफलदो भगवानिति कीर्तितः॥
(लिंगपुराण, पूर्व, ७९-४)

जो अपने उपासकों को उनके भाव के अनुरूप फल देने में सक्षम हो, उसे भगवान् कहा जाता है।

अब वर्ण विश्लेषण पर आते हैं।

संभर्त्तेति तथा भर्त्ता भकारोर्थद्वयान्वितः।
नेता गमयता स्रष्टा गकारार्थस्तथा मुने॥

“भ” वर्ण के दो अर्थ हैं, भर्त्ता (स्वामी) एवं सबका भरण पोषण करने वाला। हे मुने ! “ग” वर्ण से नेता, गमयता (अपनी ओर आकर्षित करके नेतृत्वशक्ति से ले जाने वाला), और स्रष्टा (रचना करने वाला) का अर्थ विवक्षित है।

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसश्श्रियः।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥

बिना किसी अभाव के समग्र ऐश्वर्य, बल, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य, इन छः को “भग” कहते हैं। (ये जिसमें एकत्रित हैं, वह भगवान् है। वतुप् प्रत्यय लग गया।)

वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि
स च भूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः॥

उस भूतात्मा में सभी भूत निवास करते हैं। वह भी सभी भूतों में व्याप्त रहता है, उस अविनाशी के संदर्भ में “व” वर्ण से यही जानना चाहिए। (भूत का अर्थ यहाँ पिशाच आदि नहीं, अपितु इस संसार में जो भी दृश्यादृश्य जड़ चेतन है, उसका संकेत है।)

एवमेष महाञ्छब्दो मैत्रेय भगवानिति।
परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः॥

हे मैत्रेय ! इस प्रकार यह भगवान्, ऐसा महान् शब्द बनता है। परब्रह्म वासुदेव के अतिरिक्त कोई और भगवान् नहीं है।
(विष्णुपुराण, षष्ठ अंश, अध्याय ५, श्लोक – ७३-७६)

यहां यह ध्यान दें कि उपर्युक्त वाक्य का तात्पर्य शिव जी या भगवती को नारायण से नीचा दिखाना नहीं है अपितु यह भाव है कि शिवशक्ति के रूप में भगवान् वासुदेव नारायण ही हैं। वैसे भी वेदवाक्य है,
उमाशंकरयोर्योग: स योगो विष्णुरुच्यते।
(रुद्रहृदयोपनिषत्)
जब शिवशक्ति एक होते हैं, तो उस महामिलन को ही विष्णु कहा जाता है।

उत्पत्तिं प्रलयञ्चैव भूतानामगतिं गतिम्।
वेत्ति विद्यामविद्याञ्च स वाच्यो भगवानिति॥
(अग्निपुराण, अध्याय ३७९, श्लोक – १३)

जो सभी प्राणियों के उत्पत्ति और प्रलय को, सद्गति एवं दुर्गति को तत्वतः जानता है, विद्या एवं अविद्या को भी जानता है, उसे भगवान् कहते हैं। (इसी आधार पर हम तत्वज्ञानी गुरुजनों के साथ, आद्यशंकराचार्य जी, आद्यरामानुजाचार्य जी जैसे ब्रह्मद्रष्टा महापुरुषों के नाम के साथ भगवान् शब्द लगाते हैं)

कुछ ऐसा ही मत ब्रह्मपुराण का भी है –

वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति।
ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः॥
भगवच्छब्दवाच्यानि च स वाच्यो भगवानिति।
ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय – २३४, श्लोक – ६७-६८)

जो विद्या एवं अविद्या को जानता है, उसे भगवान् कहा जाता है। भगवत् शब्द से असीमित ज्ञान, शक्ति, आत्मबल, ऐश्वर्य, सत्व, और तेज का संकेत होता है। ये सब जिसमें हों, वह भगवान् कहलाता है।

भगवानिति शब्दोऽयं तथा पुरुष इत्यपि।
वर्त्तते निरुपाधिश्च वासुदेवोऽखिलात्मनि॥
(पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय २२६, श्लोक – ६८)

भगवान्, यह शब्द जो है, तथा पुरुष, इस शब्द से भी (त्रिगुणजन्य) उपाधियों से रहित, समस्त भूतों के आत्मतत्व वासुदेव (नारायण) का बोध होता है।

आदिनारायणो देवो भगवानिति चोच्यते ॥
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, स्कंध – ०३, अध्याय – ०७, श्लोक – ४७)

आदिनारायण देव को भगवान्, ऐसा कहा जाता है।

भवभीतिं हरत्येष भक्तिभावेन भावितः।
भगवानिति यद्भावस्स तु भागवतस्स्मृतः॥
(वैखानसीय भृगु संहिता, अध्याय – ३०, श्लोक – १४३)

जो व्यक्ति भक्ति भाव से युक्त होकर, ये भव (संसार) से जन्य भीति (भय) का हरण करते हैं, इसीलिए इन्हें भगवान् कहते हैं, ऐसा भाव रखता है, उसे भागवत कहा जाता है।

वदन्ति तत्तत्त्वविदः तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध – ०१, अध्याय – ०२, श्लोक – ११)

जिसको तत्ववेत्ता जन “तत्व” कहते हैं, जिसे “स्वयं अद्वितीय ज्ञान” कहा जाता है, उसे ही ब्रह्म, परमात्मा, भगवान् आदि शब्दों से जाना जाता है।

इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि भगवान् शब्द की परिभाषा बहुत व्यापक है और मुख्यतः इसका सम्बन्ध श्रीहरि से है, ब्रह्म से है। यही शब्द स्त्रीलिंग में भगवती बन जाता है, जिसका सम्बन्ध दुर्गादेवी से है, मूलप्रकृति से है। साथ ही अत्यंत श्रेष्ठ ज्ञानी ब्रह्मवेत्ताओं के साथ भी हम आदरार्थ इस शब्द का प्रयोग कर सकते हैं।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru