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योगभ्रष्ट किसे कहते हैं ?

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(प्रश्नकर्ता महोदय मेरे इस जन्म के भौतिक पिता एवं आध्यात्मिक गुरु भी हैं, यह वार्तालाप 30 जनवरी, 2018 को हुआ था। हमारे उत्तर के अंदर जो कुछ भी ज्ञान निहित है वह आदरणीय प्रश्नकर्ता महोदय की कृपा से ही है।)

आचार्यश्री शंकरदास गुरु :
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।
इसकी व्याख्या करने की कृपा की जाय।

श्रीभागवतानंद गुरु :-

सर्वप्रथम योग क्या है, और भ्रष्टता क्या है।
योगः कर्मसु कौशलम्…
कर्म में कुशलता ही योग है !!

कर्म क्या है ?

मन के उपक्रम इच्छा, तथा देह के उपक्रम संवेदना एवं गति के सम्मिश्रित होने पर जिस घटना विशेष का निष्पादन होता है, वह कर्म है।

कुशलता क्या है ?

आनंद ही कुशल कहा गया है। आनन्द से युक्त होना ही कुशलता है। उपनिषदों ने कहा :- आनंदाद्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनंदेन जातानि जीवन्ति… इति च।

आनन्द से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। आनंद से ही उनका पोषण होता है तथा वे आनंद में ही समाहित हो जाते हैं। सृष्टि, स्थिति एवं विनाश का कारण आनन्द ही है। सृष्टि, स्थिति और विनाश का कारण ब्रह्म ही है, इसीलिए उसे चिदानंद, परमानंद, महानंद आदि संज्ञाओं से सम्बोधित किया जाता है।

जिस क्रिया प्रतिक्रिया के फलस्वरूप कर्ता, द्रष्टा तथा भोक्ता, तीनों ही आनंदित होते हैं, वही क्रिया कुशलता है।

उदाहरण :- एक चित्रविक्रेता के पास एक कलाप्रेमी ने चित्रविशेष की मांग की, जो उस समय पण्यभंडारण में नहीं थी। विक्रेता ने चित्रकार से सम्पर्क करके उसे तत्सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति करने को कहा। चित्रकार ने अत्यंत ध्यान से तदनुरूप चित्र बनाकर विक्रेता को दे दिया जो उसने अपने ग्राहक को बेच दिया। ग्राहक इसीलिए प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे अपेक्षित वस्तु मिली, विक्रेता अपेक्षित धनलाभ से प्रसन्न हुआ तथा चित्रकार को उसकी प्रशंसा, धनलाभ और गौरव से प्रसन्नता हुई। यहाँ तीनों पक्ष आनंदित हैं, अतएव चित्रकार के कार्य की, कुशलता संज्ञा हुई। चित्रकार को उसके कार्य में कुशल माना गया। यही बात मूर्तिकार, स्वर्णकार आदि भौतिक उदाहरणों से, तथा तपस्या, यज्ञ, दान आदि पारमार्थिक उदाहरणों से समझनी चाहिए।

कर्म में कुशलता (सबों को आनंदित करने की क्षमता) ही योग है। यहाँ ध्यान रहे कि शंका हो सकती है कि योद्धा की कुशलता इसमें है कि वह कितने प्राण लेता है !! फिर इसमें दोनों पक्ष कैसे आनंदित हो सकते हैं ?? परन्तु समाधान प्रश्न में ही निहित है। यदि युद्ध पराक्रम और गौरवपूर्ण रूप से लड़ा जा रहा है तो महाभारत, रामायण आदि की भांति वहां दोनों पक्ष एक दूसरे की वीरता और नीतियों की प्रशंसा भी करते थे। युद्धस्थल में विपक्षी अपने शत्रु की प्रतिभा की प्रशंसा करते थे। युद्ध के नियम होते थे, शस्त्रहीन, शरणागत, आर्त, व्यस्त, आहत, शत्रु पर प्रहार नहीं करते थे। इसीलिए हमने योद्धा कहा, व्याध नहीं।

व्याधवृत्ति कुशलता नहीं कही जाएगी। वह प्रतिभा कही जाएगी। जिस क्रिया से एक पक्ष प्रसन्न हो और दूसरा दुःखी, जिस क्रिया से एक पक्ष अभीष्टसिद्धि करे और दूसरा पक्ष मर्दित हो, वह प्रतिभा है। प्रति का अर्थ है विपक्ष, और भा का अर्थ है तेज। विपक्षी के तेज से प्रतिहत होना ही प्रतिभा है। वहीं पक्षद्वय की प्रसन्नता कुशलता है। इसीलिए सामान्य रूप से भी परिचित मित्रगणों तथा सम्बन्धियों के मिलन के अवसर पर पक्षद्वय की कुशलता पूछी जाती है, न कि प्रतिभा।

योग क्या है ?

संयोजन ही योग है। संयुक्त करने वाली क्रिया ही योग है। यदि युक्त करने का माध्यम, संयोजक भक्ति है, तो वह भक्तियोग (शबरी) है। कर्म है, तो वह कर्मयोग है (सुदामा) , ज्ञान, गान, ध्यान, सांख्य है तो वह ज्ञानयोग (वशिष्ठ), गानयोग (नारद), ध्यानयोग (सुतीक्ष्ण), सांख्ययोग (मार्कण्डेय) है।

जैसे प्रतिबिम्ब शाश्वत रूप से बिंबकारक पिंड पर आश्रित है तथा वास्तव में प्रतिबिंब तो दर्पण विक्षेप का परिणाम है, वैसे ही जिनका शाश्वत स्वरूप एकात्म है, ऐसे जीव और ब्रह्म, जो माया विक्षेप से भिन्न प्रतिभासित होते हैं, उनका मायामुक्त होकर पुनः एकात्म होना ही योग है। जैसे दर्पण नाश के लिये हथौड़ा, पत्थर आदि से नष्ट करने जैसे उग्र साधन, तथा स्थानांतरित, प्रवाहित करने जैसे सौम्य साधन हैं, वैसे ही माया विक्षेप के नाश के लिए हठयोग, अष्टांगयोग जैसे उग्र साधन, तथा भक्तियोग, गानयोग जैसे सौम्य साधन उपलब्ध हैं।

अपने कर्म में कुशलता ही योग है। योगः कर्मसु कौशलम्…
और यह कुशलता कब आती है ?? जब सुकृत और दुष्कृत की चिंता नहीं होती।
उभे सुकृतदुष्कृते इह जहाति।
सुख और दुःख को छोड़ देता है। यहीं छोड़ देता है। यहीं का अर्थ है, इसी भौतिक कलेवर में छोड़ देता है। जब इच्छाएं बची रहें और शरीर नष्ट हो जाये तो वह मृत्यु है। और इच्छाएं नष्ट हो जाएं और शरीर बचा रहे तो वह मोक्ष है। इसीलिए जीवन्मुक्त शब्द आया है। जीते ही मुक्ति होती है, और वह प्रामाणिक भी है तथा प्रत्यक्ष भी।

इच्छाओं का पूरा होना सुख है, न होना दुःख है। इस इच्छा के भी दो भेद हैं। जब कर्म का आधार भौतिक इच्छा बनती है तो वह सुख और दु:ख के रूप में फलित होती है। और जब इच्छा का आधार शास्त्रादेश बनता है तो वह निःश्रेयस के रूप में फलित होती है। निःश्रेयस न सुख है, और न दुःख है। वह आनन्द है। सुख और दु:ख परिणामाश्रित होते हैं जबकि आनन्द स्वभावाश्रित। इसीलिए ब्रह्म को सुखी या दुःखी नहीं कहा गया। अपितु आनंदित कहा गया, आनन्दमय, परमानंदमय, चिदानंदमय, सच्चिदानंदमय कहा गया। स्वभाव ही आनन्द है। स्वभाव ही अध्यात्म है।
स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते

इसी स्वभाव, इसी आनन्द, इसी आनंदमय ब्रह्म के साथ पुनः युक्त होने की प्रक्रिया योग है। उपनिषद ने कहा कि :- भोक्ता, भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा। उस परमानंद को तीन स्थितियों वाला बताया गया है। भोक्ता जीव, भोग्य माया, और प्रेरक ब्रह्म। जब भोक्ता जीव भोग्य माया से हटकर प्रेरक ब्रह्म से युक्त होने कब लिए स्वभावतः (अध्यात्मत:) सक्रिय होता है तब इस योग के मध्य यदि भोग्य माया का विक्षेप (जो त्रिगुणाश्रय से बली होता है) प्रबल हो जाये तो यह योग खण्डित हो जाता है। यही योगभ्रष्टता है।

मूल उद्देश्य से, मूल स्वरूप से इतर सबकुछ भ्रष्ट है। भ्रष्ट होने का अर्थ सर्वदा असफलता या नकारात्मक नहीं होता है। भ्रष्ट का अर्थ है मूल उद्देश्य या स्वरूप से भिन्न हो जाना। यह भ्रष्टता सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी।

जैसे घास गाय के उदर में भ्रष्ट होकर दूध, वहां से भ्रष्ट होकर दही, वहाँ से दो बार और भ्रष्ट होकर घृत बनता है। परन्तु घृत से दीपक जला सकते हैं, भोजन बना सकते हैं, घास से नहीं। यह घास की घृत के रूप में ऊर्ध्वभ्रष्टता है जो उसके मूल स्वरूप से भिन्न है। वहीं यदि गर्मी के दिन में भोजन को अधिक देर छोड़ दिया जाय तो वह भ्रष्ट होकर त्याज्य होता है। धान का चावल, और पुनः भात बनना उसकी ऊर्ध्वभ्रष्टता है और विकृति अधोभ्रष्टता। यह भी उसके मूल स्वरूप से भिन्न ही है।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभि जायते।

जो सत्य, दया आदि आंतरिक सद्गुणों से युक्त हो, तथा वैदिक संस्कार, स्नान, निर्मलता आदि बाह्य सद्गुणों से भी युक्त हो, वह शुचि है। शुचिता ही श्री अर्थात् शोभा का आधार है। शोभा ज्ञान की भी हो सकती है, धन या पराक्रम की भी हो सकती है, रूप की भी हो सकती है। आधिदैविक, आधिभौतिक या आध्यात्मिक पटल के किसी भी दैवी सम्पदा से युक्त व्यक्ति श्रीमान् है। योगभ्रष्ट व्यक्ति अपने मूल उद्देश्य एवं स्वरूप से इतर हो, ऐसे ही शुचिता युक्त श्रीमान् के यहाँ प्रादुर्भूत होता है, जिसके माध्यम से वह पुनः एक नवीन लक्ष्य, उद्देश्य और मार्ग के साथ मूल स्वरूप या आनंद में समाहित हो सके…..
योग का प्रथम मापदंड संयम पर ही आश्रित है।

सम्पराहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकत:।
सर्वत्र समताबुद्धि: स योगी भूप मे मत:॥

जो ज्ञान द्वारा इंद्रियों को विषयों से हटाकर सर्वत्र समबुद्धि रखता है, वही मेरी दृष्टि में योगी है।
(गणेशपुराण, क्रीड़ाखण्ड, सांख्यसारार्थ प्रकरण)

सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि।
आत्मसातम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः॥
जीवन्मुक्त: स योगीन्द्रः केवलं मयि संगत:।
ब्रह्मादीनां च देवानां स वंद्य: स्याज्जगत्त्रये॥

सुख, दुःख, द्वेष, क्षुधा, सन्तोष और तृष्णा में जो अपने हितानुसार आत्मभाव से ही सभी प्राणियों को देखते हुए मुझे सर्वव्यापी मानता है, वही जीवन्मुक्त है, ब्रह्मादि के द्वारा भी तीनों लोकों में वंदनीय है।

दिव्यदेहधरो योगाद् भ्रष्ट: स्वर्भोगमुत्तमम्।
भुक्त्वा योगिकुले जन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले॥

(ऊर्ध्व)योगभ्रष्ट व्यक्ति दिव्यदेह धारण करके स्वर्ग का उपभोग करने के बाद शुद्ध आचरण वाले योगियों के ही कुल में जन्म लेता है।
(गणेशपुराण, क्रीड़ाखण्ड, योगवृत्तिप्रशंसा प्रकरण)

इस मनुष्य जीवन की दुर्लभता को जान कर भी जो इसके माध्यम से आत्मोद्धार का प्रयत्न नहीं करता, उसके लिए कहा गया है :-
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्र्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।
मित्रोदासीनरिपव: संसारस्तमसः कृत:॥

देवताओं के भी प्रार्थनीय मनुष्य जन्म और उसमें भी ब्राह्मण शरीर को प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ (परमार्थ) का नाश करते हैं, वे अशुभ गति को प्राप्त होते हैं। इस संसार में मनुष्य को कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता। यह तो उसके चित्त का भ्रममात्र है। यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र, उदासीन, और शत्रु के भेद अज्ञान कल्पित हैं।

(श्रीमद्भागवत, एकादश स्कंध)

स्मृतिलोपश्च मूकत्वं बाधिर्यं मंदता ज्वर:।
जड़ता जायते सद्यो दोषाज्ञानाद्धि योगिनः॥

(अध:) योगभ्रष्ट को अज्ञान के कारण स्मृतिनाश, गूंगापन, बधिरता, मंदता, ज्वर और मूढ़ता आदि दोष तुरन्त हो जाते हैं।

(गणेश पुराण, क्रीड़ाखण्ड, योगवृत्ति प्रशंसा प्रकरण)

सप्तोत्तरं तत्र वसत्यनीशः,
संहारविक्षेपशतं सशेषम्।
तस्मादुपावृत्य मनुष्यलोके,
ततोमहान्मानुषतामुपैति॥

जो भलीभांति योगसाधन में असमर्थ हैं, वे (ऊर्ध्व) योगभ्रष्ट पुरुष सौ कल्पों तक सत्यादि सप्तोत्तर लोकों में निवास करते हैं। फिर बचे हुए कर्म संस्कारों के सहित वहां से लौटकर मनुष्यलोक में पहले से अधिक श्रेष्ठ संस्कार से सम्पन्न हो मनुष्य शरीर पाता है।

(वृत्रगीता, मोक्षधर्म प्रकरण)

आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र,
वीराध्वनः पारमुपैति योगम्॥
(उन अज्ञानियों में से किसी ने भी) न लौट पर परमानन्दमय योगविधि से परमात्मा को प्राप्त किया और न ही स्वबल से संसारचक्र को पार ही कर सके।
(श्रीमद्भागवत, पंचम स्कंध)

यो वै न पापे निरतो न पुण्ये,
नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे।
विमुक्तदोष: समलोष्टकाञ्चनो,
विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धे:॥
शरीरमेवायतनं सुखस्य,
दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम्।
यद्यच्छरीरेण करोति कर्म,
तेनैव देही समुपाश्नुते तत्॥

जो न पाप में लगा हो और न पुण्य में, न तो अर्थोपार्जन में तत्पर हो, न धर्म में और न काम में ही। वह सब प्रकार के दोषों से रहित मनुष्य सुख और दुःख को देने वाली सिद्धियों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टी के ढेले और सोने में उसका समान भाव हो जाता है। यह शरीर ही सुख और दुःख का आधार है। देहाभिमानी पुरुष शरीर से जो जो कर्म करता है, उसी के अनुरूप वह सुख एवं दुःख को भोगता है।
(महाभारत, शांतिपर्व)

न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान् बिभ्यति।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
जब मनुष्य किसी से भय नहीं मानता, तो इससे भी किसी को भय नहीं होता। जब यह किसी को चाहता नहीं, तो द्वेष भी नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त कर चुका है, ऐसा जानना चाहिए।
(महाभारत, शांतिपर्व)

आकिञ्चन्ये च राज्ये च विशेष: सुमहानयम्।
नित्योद्विग्नो हि धनवान् मृत्योरास्यगतो यथा॥
नैवास्याग्निर्न चारिष्टो न मृत्युर्न च दस्यवः।
प्रभवन्ति धनत्यागाद् विमुक्तस्य निराशिष:॥

अकिंचनता तथा राज्य में बड़ा भारी अंतर यह है कि धनी राजा सदा इस प्रकार उद्विग्न रहता है, मानो मौत के मुख में पड़ा हुआ हो। परन्तु जो मनुष्य धन को त्यागकर उसकी आसक्ति से मुक्त हो गया है और मन में किसी तरह की कामना नहीं रखता, उसपर न अग्नि का जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहों का, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है, न डाकू और लुटेरे ही।
(शम्पाकगीता)

न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम्।
युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनु तिष्ठता॥
यदि वाप्युपपद्येत पौरुषं नाम कर्हिचित्।
अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते॥

मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्य में नहीं है, उस धन को वह श्रद्धापूर्वक भलीभांति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता। यदि कभी कोई पुरुषार्थ सफल होता दिखाई देता है, तो वहाँ भी खोज करने पर दैव का ही सहयोग होता है।
(मङ्कीगीता)

अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः।
उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते॥
जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतों को नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलय के तत्व को जानता है, उसके लिए यहाँ कौन सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है ?
(महाभारत, शांतिपर्व)

इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम्।
एवमीहासुखासक्तं कृतांतः कुरुते वशे॥
जातमेवान्तकोऽन्ताय जरा चान्वेति देहिनम्।
अनुषक्ता द्वयेनैते भावा: स्थावरजंगमा:॥

मनुष्य सोचता है कि यह काम पूरा हो गया, यह अभी करना है और यह अधूरा ही पड़ा हुआ है, इस प्रकार चेष्टाजनित सुख में आसक्त हुए मानव को काल अपने वश में कर लेता है। देहधारी जीव के जन्म लेते ही अंत करने के लिए जरा एवं मृत्यु उसके पीछे लग जाते हैं। समस्त चराचर प्राणी इन्हीं दोनों से बंधे हुए हैं।
(मेधावीगीता/पुत्रगीता)

भूयो भूयो जन्मनोऽभ्यासयोगाद्,
योगी योगं सारमार्गं विचिंत्य।
दानं च वेदाध्ययनं तपश्च,
काम्यानि कर्माणि च वैदिकानि॥
व्रतं यज्ञान् नियमान् ध्यानयोगान्,
कामेन यो नारभते विदित्वा।
यद् यच्चायं कामयते स धर्मो,
न यो धर्मो नियमस्तस्य मूलम्॥

योगी पुरुष अनेक जन्मों के अभ्यास से योग को ही मोक्ष का मार्ग निश्चित करके कामनाओं का नाश कर डालता है। जो इस बात को जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म, व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान योगादि का कामनापूर्वक अनुष्ठान नहीं करता (अपितु निष्काम करता है)…
वास्तव में कामनाओं का निग्रह नियमन ही धर्म है, और वही मोक्ष का मूल है। कामनायुक्त कर्म सच्चा धर्म नहीं।
(महाभारत, आश्वमेधिक पर्व)

हरति परधनं निहन्ति जंतून्,
वदति तथानृतनिष्ठुराणि यश्च।
अशुभजनित दुर्मदस्य पुंसः,
कलुषमतेर्हृदि तस्य नास्त्यनन्तः॥
जो पुरुष दूसरों के धन का हरण करता है, जीवों की हिंसा करता है, तथा मिथ्या और कटुभाषी है, उस अशुभ कर्मों से उन्मत्त दुष्ट के हृदय में सर्वव्यापी भगवान विष्णु भी नहीं रह सकते।
(विष्णुपुराण)

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रह मेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांश्चेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥

आत्मा को रथी और शरीर को रथ समझो। बुद्धि को सारथीं और मन को लगाम समझो। विवेकी पुरुष इंद्रियों को घोड़े, विषयों को मार्ग, तथा देहान्द्रिय से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं।
(अग्निपुराण)

सात्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्वविवृद्धये।
ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत् स्मृतिरपोहनम्॥
जब तक अपने आत्मा का साक्षात्कार न हो और त्रिगुण्यप्रधानशरीर के मोह से निवृत्ति न हो, तब तक सत्वगुण की वृद्धि के लिए सात्विक शास्त्र का ही सेवन करे। क्योंकि उसी से धर्म की वृद्धि होती है, जिससे पुनः अंतःकरण की शुद्धि एवं आत्मज्ञान होता है।
(श्रीमद्भागवत, एकादश स्कंध)

वेदोपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद्दम:।
दमस्योपनिषन्मोक्ष एतत् सर्वानुशासनम्॥
वेदाध्ययन का सार है सत्यभाषण, सत्यभाषण का सार है इन्द्रियसंयम और इन्द्रियसंयम का फल है मोक्ष। यही सम्पूर्ण शास्त्रों का उपदेश है।
(हंस गीता)

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम॥
सत्य बोलना श्रेष्ठ है, परन्तु सत्य से भी श्रेष्ठ है, हितकारक वचन बोलना। जिससे प्राणियों का अत्यंत हित होता हो, वही मेरे मत में सत्य है।
(नारद गीता)

न क्वचित् सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः।
स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलब्धात् पुनः पुनः ॥

जीव को कहीं भी अत्यंत सुख नहीं मिलता। किसी भी लोक में वह सदा नहीं रह पाता। तपस्या आदि अनेक कष्टप्रद उपक्रमों के द्वारा उच्च लोकों को प्राप्त करके भी वह बार बार नीचे ही आता है।
(उत्तरगीता/अनुगीता)

अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणम्,
तद्धानमेवात्र विधौ विधीयते।
विद्यैव तन्नाशविधौ पटीयसी,
न कर्म तज्जं सविरोधमीरितम्॥
संसार का मूल कारण अज्ञान ही है और इन शास्त्रों में उसके नाश का ही उपाय बताया गया है। अज्ञान का नाश करने में ज्ञान ही समर्थ है, सकाम कर्म नहीं, क्योंकि अज्ञान से उत्पन्न होने वाला कर्म उसका विरोधी नहीं हो सकता।
(अध्यात्मरामायण, उत्तरकाण्ड)

सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य” इस न्याय सूत्र के अनुसार जो जिससे उत्पन्न होता है वह उस सम्बन्ध के नाश का कारण नहीं हो सकता। इसी कारण अज्ञान से उत्पन्न कर्म से अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता।

नित्य: सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः ॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदोऽव्यक्त स्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥
आत्मा तो नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ, दोषरहित, और एक है, किंतु माया की शक्ति से उसमें भेद प्रतीत होता है, स्वभावतः नहीं। इसीलिए ज्ञानीजन यथार्थ में अद्वैत की ही सत्ता कहते हैं,किंतु माया के आत्मा के साथ लगी रहने के कारण वह अव्यक्त आत्मा भी स्वभावतः द्वैतभेद वाली प्रतीत होने लगती है।
(अद्भुत रामायण)

द्वेषमूलो मनस्तापो द्वेषः संसारखंडनम्।
मोक्षविघ्नकरो द्वेषस्तं यत्नात्परिवर्जयेत् ॥
द्वेष मन के संताप का मूल है, सांसारिक सम्बन्धों को भंग करने वाला तथा मोक्ष के मार्ग में विघ्न उत्पन्न करने वाला है, अतः द्वेष का प्रयत्न पूर्वक परित्याग कर देना चाहिए।
(महाभागवत उपपुराण, पार्वतीगीता)

अहो भुवन कल्लोलैर्विचित्रैर्द्राक् समुत्थितं।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते॥
आश्चर्य है, मुझ अनन्त महासमुद्र में जब चित्तरूपी वायु चलने लगती है तब झटपट बहुत से दृश्य पदार्थों की तरंगें उठने लगती हैं।
(अष्टावक्र गीता, द्वितीय प्रकरण)

येन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि।
योगिन्स्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे॥
योगिजन जिस किसी भी भाव से जहां कहीं भी देहत्याग करें, वे वैसे ही परब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं जैसे घट के छिन्न होने पर घटाकाश महाकाश में विलीन हो जाता है।
(अवधूत गीता)

कर्म सर्वत्र आदिष्टं न जानाति च किञ्चन।
कर्म ब्रह्म विजानाति जीवन्मुक्त: स उच्यते॥
अनादिवर्ती भूतानां जीवः शिवो न हन्यते।
निर्वैरः सर्वभूतेषु जीवन्मुक्त: स उच्यते॥

शास्त्रविहित निष्काम कर्म के अतिरिक्त कुछ और न जानता हुआ जो कर्म को ब्रह्मरूप मानकर संपादित करता रहता है, प्राणियों में स्थित शिवस्वरूप जीवात्मा अनादि है और इसका नाश न सम्भव है और न वांछित, ऐसा जानकर सभी प्राणियों के प्रति द्वेष का दमन करने वाला व्यक्ति ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा गया है।
(जीवन्मुक्त गीता)

अतएव अपने इच्छाओं का दमन करके शास्त्रानुसार कर्म में निष्काम भाव से प्रवृत्त होकर निर्वैरता का पालन ही योगी होना है। ऐसा योगी यदि योगभ्रष्ट भी होता है तो ऊर्ध्वगति को प्राप्त करके सम्मानित होता है।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru